श्री बलराम जयंती (जन्मोत्सव) एवं हल षष्ठी का पर्व ।।

संवत् २०७६ भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष षष्ठी बुधवार 21 अगस्त 2019।। श्री बलराम जयंती एवं हल छठ की हार्दिक शुभकामनाएं।।

हमारे भारत वर्ष में हल षष्ठी एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। यह भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम को समर्पित है। भगवान बलराम माता देवकी और वासुदेव जी के सातवें संतान थे। हल षष्ठी का त्योहार भगवान बलराम की जयंती के रूप में मनाया जाता है आज के दिन भगवान श्री कृष्ण के बड़े भ्राता बलराम जी का जन्म हुआ था बलराम जी का शस्त्र हल था इसलिए इस दिन हल की पूजा की जाती हैं साथ ही बैलों की भी पूजा की जाती हैं इसलिए इसे किसानो का त्यौहार भी कहते हैं।।

इसे राजस्थान जैसे अन्य राज्यों में विभिन्न नामों से जाना जाता है, इसे गुजरात में चंद्र षष्ठी के रूप में जाना जाता है, और ब्रज क्षेत्र में बलदेव छठ को रंधन छठ के रूप में जाना जाता है। भगवान बलराम को शेषनाग के अवतार के रूप में पूजा जाता है, जो क्षीर सागर में भगवान विष्णु के हमेशा साथ रहिने वाली शैया के रूप में जाने जाते हैं।

संबंधित अन्य नाम भी प्रचलित हैं।

बलराम जयन्ती, ललही छठ, बलदेव छठ, रंधन छठ, हलछठ, हरछठ व्रत, चंदन छठ, तिनछठी, तिन्नी छठ आदि नामों से जाना जाता है।

हल छठ का त्यौहार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है, कुछ लोग हल छठ का त्यौहार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाते हैं। माताएं अपने पुत्रों की दीर्घायु, पुत्र की अकाल मृत्यु से रक्षा वा अपने पुत्रों की लंबी आयु और उसके सुखद समृद्ध जीवन की कामना के लिए यह त्यौहार बड़े उत्साह के साथ पुरे विधि विधान से करती हैं।

इस वर्ष संवत् २०७६ सन् 2019 में हल छठ का त्यौहार 21 सितंबर 2019 दिन बुधवार को मनाया जाएगा।

इस व्रत का पालन करने वाली महिलाएं इस दिन हल से जुती हुई सामग्री अर्थात अनाज नहीं खा सकती हैं। ना ही गाय का दूध, दही या घी खा सकती हैं। उस दिन उन्हें केवल वृक्ष पर लगे हुए खाद्य पदार्थ तथा बिना जोते हुए खेतो साग वा अन्न खाने की अनुमति होती है।

हर छठ की पूजा सामग्री (हर छठ हाल षष्ठी व्रत की सामग्री)

  • 1 भेंस का दूध, घी, दही गोबर।
  • 2 महुये का फल, फुल एवम पत्ते
  • 3 जवार की धानी
  • 4 ऐपन
  • 5 कुल्वे (छोते से मिट्टी के कुल्हड़)
  • 6 देवली छेवली (बांस और महुये के पत्ते से बना होते हैं।)
  • 7 कुशा

हल हर षष्ठी के नियम एवम पूजा विधि (हर छठ हाल षष्ठी व्रत पूजा विधान)

प्रात: काल उठकर महुए के दातून से दांत साफ किए जाते हैं। इस दिन बिना हल के जूते से खाद्य पदार्थ खाये जाते हैं। पसई धान(तिन्नी) के चावल, केरमुआ के साग, महुआ, भैंस के दूध का उपयोग भोजन में किया जाता है। भोजन पूजा के बाद किया जाता है। यह व्रत पुत्रवती स्त्रियाँ ही करती हैं।

इस व्रत की पूजा के लिए भैंस के गोबर से पूजा घर में घर की दिवार पर हर छठ माता का चित्र बनाया जाता है। एपन तैयार किया जाता है। उससे चित्र का श्रृंगार किया जाता है।

ऐपन बनाने की विधि: पूजा के चावल को पानी में भीगा कर रखा जाता है। फिर उसे सिल बट्टे पर पिस कर उसमे हल्दी मिलाई जाती हैं। एक लेप की तरह घोल तैयार होता है उसे ऐपन कहते हैं।

इस चित्र में हल, सप्त ऋषि, पशु, किसान मान्यत के अनुसार कई चित्र बनाये जाते हैं।

कई परिवार केवल हाथों के छापे बनाकर उनकी पूजा करते हैं। कठो में ऐपन लगाकर उसके छापे दीवार पर बनाकर उनकी पूजा करते जाते हैं।
पूजा के लिए पाटे पर कलश मंदिर जाते हैं। गणेश जी एवम माता गौरा को स्थापित किया जाता हैं। साथ ही मिट्टी के कुल्वे में ज्वार की धानी एवम महुआ का फल भरा जाता है। एक मटकी में देवली छेवली को रखा जाता है।

सबसे पहले कलश की पूजा कर गणेश जी एवम माता गौरा की पूजा की जाती हैं। फिर हर छठ माता की पूजा की जाती हैं। उसके बाद कुल्वे एवम मटकी की पूजा की जाती हैं। पूजा के बाद हर छठ की कथा वाचन जाते हैं। माता जी की आरती की जाती हैं।

आरती के बाद उसी बैठकर महुएं के टुकड़ों पर महुये का फल रख कर उसे भेस के दूध से बने दही के साथ अमृत होते हैं।

कहीं कहीं पर शाम के समय पूजा के लिये मालिन हरछ्ट बनाकर लाती है। हरछठ में झरबेरी, कास (कुश) और पलास तीनों की एक-एक डालियाँ एक साथ बँधी होती है। जमीन को लीपकर वहाँ पर चौक बनाया जाता है। उसके बाद हरछ्ठ को वहीं पर लगा देते हैं । सबसे पहले कच्चे जनेउ का सूत हरछठ को पहनाते हैं।

पूजा के बाद व्रत पूरा करने के लिए भोजन में पसई धान (तिन्नी)के चावल एवम भैंस के दूध से बनाए वस्तुएं खा सकते हैं।

हर छठ पूजा कथा एवम महत्व (हर छठ हाल षष्ठी व्रत कथा):

छठ पर्व कैसे शुरू हुआ इसके पीछे कई ऐतिहासिक कहानियां प्रचलित हैं।
वसुदेव-देवकी के 6 बेटों को एक-एक कर कंस ने कारागार में मार डाला। जब सातवें बच्चे के जन्म का समय नजदीक आया तो देवर्षि नारद जी ने देवकी को हलषष्ठी देवी के व्रत रखने की सलाह दी थी। देवकी ने इस व्रत को सबसे पहले किया जिसके प्रभाव से उनके आनेवाले संतान की रक्षा हुई।

सातवें संतान का जन्म समय जानकर भगवान श्री कृष्ण ने योगमाया को आदेश दिया कि माता देवकी के इस गर्भस्थ शिशु को खींचकर वसुदेव की बड़ी रानी रोहिणी के गर्भ में पहुंचा देना, जो कि इस समय गोकुल में नंद-यशोदा के यहां रह रही है तथा तुम स्वयं माता यशोदा के गर्भ से जन्म लेना।

योगमाया ने भगवान के आदेश का पालन किया जिससे देवकी के गर्भ से संकर्षण होकर रोहणी के गर्भ से संतान के रूप में बलराम का जन्म हुआ। उसके बाद देवकी की आठवीं संतान के रूप में साक्षात भगवान श्री कृष्ण प्रकट हुए। इस तरह हलषष्ठी देवी के व्रत-पूजन से देवकी के दोनों संतानों की रक्षा हुई।

एक मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। इसकी शुरुआत सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य की पूजा करके की थी। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे और वो रोज घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही परंपरा प्रचलित है। छठ पर्व के बारे में एक कथा और भी है। इस कथा के मुताबिक जब पांडव अपना सारा राजपाठ जुए में हार गए तब दौपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी हुई थी और पांडवों को अपना राजपाठ वापस मिल गया था। लोक परंपरा के मुताबिक सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना फलदायी मानी गई।

महाभारत में अभिमन्यु की मृत्यु के बाद एक और इतना ही बड़ा पाप अश्वत्थामा ने पांच पाण्डवों और द्रौपदी के पांच पुत्रों को मारकर किया । अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र का असर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ पर भी पड़ा । उत्तरा का गर्भ दुग्ध होने लगा । पांडवों ने वंश की रक्षा हेतु श्रीकृष्ण की सलाह मांगी।

श्रीकृष्ण ने उपाय बताते हुए कहा । भाद्र मास के कृष्ण पक्ष षष्ठी को मेरे बड़े भाई बलराम जी का जन्म हुआ था। वह सम्पूर्ण धारा के गर्भ के रक्षक हैं । वही इस गर्भ की भी रक्षा करेंगे । उत्तरा उनके जन्मदिवस पर उनकी विधि विधान से पूजा करे एवं उनसे अपने गर्भ की रक्षा करने का वरदान मांग ले । उत्तरा ने वैसा ही किया ।

भाद्र मास के कृष्ण पक्ष षष्ठी को शेषनाग के अवतार भगवान बलराम का व्रत किया और हलधर से अपने गर्भ की रक्षा का वरदान ले लिया । तदुपरान्त उत्तरा को परीक्षित नामक पुत्र की प्राप्ति हुई ।
तभी से यह व्रत बलराम जी के जन्म के उपलक्ष्य में भी मनाया जाता है। बलराम जी का मुख्य शस्त्र हल है इसलिये इस व्रत को हलषष्ठी कहते हैं।

दंत कथाओं के अनुसार-

एक ग्वालिन थी वो दूध दही बेचकर अपना जीवन चालन करती थी। वह गर्भवती थी। एक दिन जब वह दूध बेचने जा रही थी तो उसे प्रसव का दर्द शुरू हुआ। वह समीप पर एक पेड़ के नीचे बैठ गई जहाँ उसने एक पुत्र को जन्म दिया। गोवालिन को दूध ख़राब होने की चिंता थी, इसलिए अपने बेटे को पेड़ के नीचे सुलाकर वो गाँव में दूध बेचने चली गई। उस दिन हर छठ व्रत में सभी को भेंस का दूध चाहिए था। ग्वालिन के पास केवल गाय का दूध था उसने झूठ बोलकर सभी को भेस का दूध बताकर पूरा गाय का दूध बेच दिया। इससे हर छठ माता क्रोधित हो गई। और उसके बेटे के प्राण हरदम। जब ग्वालिन आई उसे अपनी करनी पर बहुत संताप हुआ और उसने गाँव में जाकर सभी के सामने अपने गुनाह को स्वीकार कर लिया। सभी से पैर पकड़कर क्षमा मांगी। उसके इस तरह से विलाप को देख कर उसे सभी ने माफ़ कर दिया। जिससे हर छठ माता प्रसन्न हो गई। और उसका बेटा जीवित हो गया। तब से ही पुत्र की लंबी उम्र के लिए हर छठ माता का व्रत एवम पूजा की जाती हैं।

कहा जाता है कि जब बच्चे पैदा होते हैं तब से लेकर छह: महीने तक छठी माता के बच्चे की देखभाल करती हैं। उसे हँसाती हैं। उसका पूरा ध्यान रखती है इसलिए बच्चे के जन्म के छः दिन बाद छठी की पूजा भी की जाती है।हर छठ माता को बच्चो की रक्षा करने वाली माता भी कही जाती हैं।

गंगाद्वारे कुशावर्ते विल्वके नीलेपर्वते।
स्नात्वा कनखले देवि हरं लब्धवती पतिम्‌॥

ललिते सुभगे देवि-सुखसौभाग्य दायिनि।
अनन्तं देहि सौभाग्यं मह्यं, तुभ्यं नमो नमः॥

– अर्थात् हे देवी! आपने गंगा द्वार, कुशावर्त, विल्वक, नील पर्वत और कनखल तीर्थ में स्नान करके भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त किया है। सुख और सौभाग्य देने वाली ललिता देवी आपको बारम्बार नमस्कार है, आप मुझे अचल सुहाग दीजिए।
बोलो छठठी मैया की जय ।।

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