पाबूजी राठौर का इतीहास

मारवाड मे राठौर राज्य की नींव डालने वाले, जोधपुर के राठौरो के मूलपुरुष राव सीहाजी की चौथी पीढी मे पाबूजी हुए। ये राव यासथानजी के पौत्र और धांधलजी के पुत्र थे। पाबूजी का जन्म ग्राम कोलु मे एक अपसरा के गर्भ से हुआ। महवे से कोलु आते हुए धांधलजी ने इस अप्सरा से विवाह किया था। ये जनश्रुती की पुष्टी मुहता नीणसी ने भी की है। पाबुजी को शीशु रुप मे छोडकर ये अप्सरा देवलोक को चली गइ। पाबुजी के लालन पालन के लीए धाय रखी गइ। पाबुजी श्री राम के भाई शेष नारायण लक्ष्मण के अवतार माने जाते है, और धांधलजी को नवनाथ की क्रिपा प्रसादी के रुप मे पाबुजी पुत्र के रुप मे प्रगट हुये। पाबूजी हिन्दुओ के पांच मुख्य पीर मे से एक है।

पाबू हडबू रामदे, मांगलिया मेहा।
पंचो पीर पधार जो, गोगाजी जेहा॥

पाबूजी का जन्म रामदेवपीर से ११० वर्ष पुर्वे विक्रम संवत १२९९ मे हुआ। इस विषय मे महाकवि मोडजी आशिया कृत ऐतिहासिक महकाव्य ‘पाबू प्रकास’ प्रस्तुत सोरठा विश्वसनीय एवम प्रामाणिक है-

बारौ संवत पेख, निसचै बरष निनांणओ।
पाबू जनम संपेष, मासोतम फागुण मुकर॥

धांधलजी भी पाबूजी के बाल्यकाल मे स्वर्गवासी हो गये। उनके ज्येषठ पुत्र बूडाजी (प्रथम पत्नी से उत्पन)गादी पर बैठे। पाबूजी अपनी धाय के साथ प्रूथक ही रहेते थे और बहुत गरीबी मे पले। जालोर की तरफ अन्ने बाघेले नामक शक्तीशाली ठाकर के पुत्र को मारके आये भिलो को पाबूजी ने आश्रय दिया। अपने बटे के वैर में अन्ने बाघेले ने इन भीलो के पीता को मार दीया था। पाबूजी राठौर ने सिरोही जाते समय इन भीलो को भी साथ मे रखा और अन्ने बाघेले को मारकर अपने आश्रीत भीलो का वैर लिया। सिरोही के रावदेवडा को पाबूजी की बहन सोनीबाइ दी हुइ थी। अन्ने बाधेले की पुत्रीभी राव देवडा की दुसरी पत्नी थी जो सोनबाइ को आभूषणो के आभव के कारण हमेशा ताने देती रहती थी,इसी सदर्भ मे रावदेवडा और सोनबाइ मे कहासुनी हो गई। रावदेवडा ने सोनबाई को चाबुक मारा। सोनबाइ के संदेश पर पाबूजी सिरोही आये तो उनके बह्नोई रावदेवडा पाबूजीसे क्षमायाचना करके छुटे। अन्ने बाघेले की विध्वा पत्नी के गहेने उसके बेटे ने पाबूजी को समझोते के रुप मे भेंट दिये थे जो इस समय उन्होने अपनी बहन सोनबाई कोपहनने के लीये दे दिये।

पाबूजी की एक बहन जींदीराव खीची को दी गई थी,उसी गांव मे देवल चारणी के पास ‘केसर कालमी’ नामक अदभुत घोडी थी। वह धोडी बुडोजी ने भी मांगी थी पर नही मीली और जींदीराव खीची भी मुह मांगी कीमत देकर घोडी लेना चाह्ता था किन्तु देवल चारणी ने घोडी कीसीभी किमत पर उन दोनो को नही दी। यही धोडी उसकी गायो की रखवाली कीया करती थी। पाबूजी ने गायो की रक्षा करने का वचन देकर ये घोडी देवलजी से प्राप्त करली। गायो की रक्षार्थ प्राण देने का प्रण करके प्राप्त कीगई धोडीके कारण पाबूजी को अपने बडे भाई बूडोजी के वैमनस्य का पात्र होना पडा। उधर जींदीराव खीची देवल चारणी से नारज हो गया। बूडोजी की पुत्री ( पाबूजी की भतीजी) का विवाह गोगाजी चौहान के साथ हुआ तथा बूडोजी ने यथा सामर्थय दहेज दिया किन्तु पाबूजी के पास उस समय बूढी उट्नी के अतीरीक्त कुछ नही था,तो उनहोने सिंघ में लंकेउगाव के शक्तिसम्मपन जागीरदार दोदें सुमरे का टोला (उट-उट्नीयो का वर्ग) लूट कर दहेज के रुप मे देने का संक्लप किया। इस उदेस्य से पाबूजी ने ‘केसर कालमी’ घोडी देवलजी से ली थी। ईस घोडी को लेने के बाद ही पाबूजी ने सिरोही के राव देवडा (बहनोई)का अभीमान नष्ट किया। अन्ने बाधेले जेसे पराक्रमी जागीरदार को मारा।बूडोजी के ससुराल डीडवान के डोडो को बंदी बनाकर अपनी भाभी का अंहकार मर्दन किया तथा अपने सेवक हरिया (हरमल)राइका को सिंध भेज कर दोदे सुमरे के टोले का अता पता मालुम किया और अपने आश्रित चांदा,डेंबा आदि सातो भींलो को साथ लेकर सिंघ पहुंचे। मार्ग मे मीजखान का ठीकाना आया,मीजखान ने पाबूजी का वर्णन सुन रखा था,उसने बहुतसा द्र्व्य भेंट करना चाहा परन्तु पाबूजी ने नहीं लिया, केवल सात घोडे भेंट स्वरुप स्वीकार किये और ये घोडे अपने भींलो को चडने के लिये दिये।

लंकेउ जाते समय पंचनद को पार कर दैविक (अलौकिक)कला का परिचय दिया। दोदें सुमरे का टोला लुट लाये। दोदा सुमरा वाहर चढा था परन्तु मीर्जाखान से यह सुना कि यही पाबूजी ने अन्ने बाघेले को मारने वाले है,तब वापस लौट गया। उटउट्नीयो का बहुत बडा वर्ग अपनी भतीजी को दहेज के रुप मे देकर अपना संकल्प पुरा किया। गोगाजी भी चम्तकृत हुए। सिंध से दोदे सुमरे का टोला लूटकर आते समय पाबूजी की सगाई अमरकोट के राव सुरजल की पुत्री राजकुमारी सोढी के साथ हुई। टोला भतीजी को देने के बाद बारात लेकर पाबूजी विवाह के लिए अमरकोट पहुंचे।अपशुकन हुए।बूडोजी पेट दर्द का बहाना बना कर बारात मे नहीं गये। विवाह करके पाबूजी वापिस कोलू लौटे उसी रात जींदीराव खींची ने देवल चारणी की गाये लूट ली। देवलजी ने कालू आकर बूडाजी को पुकारा परन्तुं उसने पेट दर्द का बहाना बनाकर उसने पाबूजी के पास जाने को कहा, वह नवविवाहित दम्पती के सुख मे विघ्न नही डालना चाहती थी केवल भीलों को साथ लेकर ही गाये साथ लाना चाहती थी परन्तु भीलो कि एक एक पुत्री के विवाह के अवसर पर एक साथ सात बाराते आ गई। वे सब इस जमेले मे उलजे हुए थे, किन्तु देवलजी और भीलों की बातचीत की भनक पडते ही पाबूजी अपने प्रतिज्ञा के पालन हेतु तत्काल गायो की रक्षार्थ चढ गये, अपने बहनोई जींदराव खींची को जा ललकारा। गाये वापस लाकर कूए से पानी सींच कर गाये पिला रहे थे तब किसी व्यक्ती ने बूडोजी को झुठा ही पाबूजी को जींदीराव खींची द्वारा मारे जाने का समाचार दिया। जीवनभर चाहे वैमन्सय रखा हो परन्तु अपने भाई की म्रुत्यु के समाचार सुनते ही उसक खुन खौल उठा वो जींदीराव खींची से जा भिडे और खींचीयो के हाथो मारे गये। तब बूडोजी और पाबूजी के परक्रम से परिचीत खीची भयपीत हो गये।पाबूजी गाये पिला रहे थे वहा आकर उसने निहथ्थे पाबूजी पर आक्रमण वार कर दिया और जिससे पाबूजी वीरगती को प्राप्त हुए।सोढी रानी पाबूजी के साथ सती हुई किन्तु बूडोजी कि रानी गर्भवती थी उनको सती होने से रोका गया।तब उसने अपने पेट को अपने ही हाथो से चीर कर (झरडा देकर) पुत्र उत्पन्न किया, उसके बाद वह सती हो गई।बूडोजी का यह पुत्र इस प्रकार उत्पन्न होने के कारण उसको झरडाजी नामसे पुकारा गया। झरडाजी ने अपनी अल्प आयु मे जींदीराव खींची को मार कर अपने पीता और चाचा का वैर लिया। फलौदी तहसील के जालोडा गांव के पास एक छोटी सी पहाडी के पास जब झरडाजी वापस आ रहे थे तो खींचीयो ने उसका पीछा करके मार दिया। यह स्थान अब भी ‘झरडेजी की भाखरी’ के नाम से प्रसिद्ध है। झरडाजी लोकदेवता केरुप में इस क्षेत्र मे पुजे जाते है।

पाबूजी अपने नवयौवन में ही २४ वर्ष की अवस्था में विक्रम संवत १३२३ की श्रावण शुक्ला दशमी के दिन वीरगति को प्राप्त हो गये।इसी विषय मे मोड्जी आशिया का यहदुहा प्रसिध्ध है कि-

तेरह रौ तेवीसियौ, सांवणा दसमी स्वेत।
पाल समर पडियो प्रसिध्ध हठी वरन रै हेथ ॥

पाबूजी के जन्म स्थान के विष्य में यह लोक धारणा प्रचलित है कि उनका जन्म बाड्मेर के पास खारी खाबड क्षेत्र के जूना नामक ग्राम में हुआ। धांधलजी के द्वरा यह गांव छोड देने के बाद यह कथन लोक-प्रसिध्ध हुआ कि-‘ जूनो पडियौ सूनौ ‘ अर्थात यह गांव उजड गया है, जो पुनः आबाद नहि हुआ। प्रसिध्ध इतिहासकार मुहता नैणसी के अनूसार पाबूजी का जन्म स्थान ग्राम कोलू है, जो अपेक्षाकृत एवं तर्क संगत प्रतीत होता है।गोरक्षक प्रणपालक शुरवीर पाबूजी कि कर्मस्थाली निश्चित रुप से ग्राम कोलू हि रही है, इसमे कोई दो राय नहीं है। देवल परिसर मे दो मंदिर है। प्रथम का निज भाग जोधपुर के संस्थापक जोधाजी के पाटवी पुत्र राव सातल ने बनवाया अर्थात निज मंदिर की स्थापना १६ वीं सदी मे राव सातल ने की, जिसका शेश भाग बीकानेर के महाराजा रायसिंहजी ने बनवाया।

दूसरा मंदिर जोधपुर के महाराजा अभयसिंहजी ने विं.सं. १७६८ में बनया। लोक प्रसिध्ध है कि पाबूजी के ‘परचे’ (चमत्कार) से ही वे अहमदाबाद का युध्ध जीते थे। पाबूजी के मंदीर के चारो ओर दूर-दूर तक बहूत बडा ‘ओरण’ (गोचर भूमी वअरण्य) है, जहा वृक्षो कि कटाई व्रर्जित है। जीससे पाबूजी के पेडो के प्रति

प्रीत एवं पर्यावरण रक्षा में उनका महत्वपूर्ण योगदान का अनुमान लगाया जा सकता है। लोक आस्था के अधार एवं पांच पीरो मे प्रथम पीर पाबूजी आज भी भक्तो के संकट निवारण हेतु ‘हेले-हाजर’ है।

संदर्भ :
बाबा रामदेव इतिहास एवं साहित्य डॉ.सोनाराम बिशनोई

प्रेषित एवं टंकन :
मयुर सिध्धपुरा- जामनगर
मो.नं. 9725630698

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